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July 6, 2026

जौनपुर क्षेत्र का ऐतिहासिक मोड मेला पारम्परिक बाध्य यंत्रों के साथ धूमधाम से मनाया गया

मसूरी । जौनपुर क्षेत्र में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी ऐतिहासिक मोड मेला पारंपरिक बाध्य यंत्रों के साथ धूमधाम से मनाया गया।

मेले में मसूरी सहित निकटवर्ती 114 से अधिक गांव की लोग शिरकत किया ।

मेले में बच्चे युवा और बुजुर्गों ने बड़ी संख्या में शिरकत की l मेले का शुभारंभ वाद्य यंत्रों के साथ टिमरू के पाउडर को नदी में डालकर किया गया जैसे टिमरू का पाउडर नदी में बहने लगा वैसे ही बड़ी संख्या में ग्रामीण भी मछलियां पकड़ने के लिए नदी में उतर गए

इस बारे में स्थानीय निवासी राजेश नौटियाल..सूरज सिंह रावत ने बताया कि शनिवार को सुबह करीब 10 बजे अगलाड़ नदी में मौण मेले का शुभारंभ पारंपरिक वाध्य यंत्रों के साथ किया गया। उन्होंने बताया कि नदी में डाले जाने वाले टिमरू के पाउडर को बनाने की जिम्मेदारी इस साल काण्डी तल्ला, काण्डी मल्ली. मेलेंगढ. सडब तल्ला, सडब मल्ला, बेल तथा परोगी सहित कई गांवों के ग्रामीणों की थी l

गौरतलब है कि मछली पकड़ने के लिए औषधीय पादप टिमरू की छाल से तैयार पाउडर बनाया जाता है। इसे मौण के नाम से जाना जाता है। अगलाड़ नदी के मौणकोट नामक स्थान से पाउडर को पानी में मिलाया जाता है। क्षेत्र के हजारों की संख्या में बच्चे, युवा और बुजुर्ग नदी की धारा के साथ मछलियां पकड़ने उतर जाते हैं। खास बता यह है कि टिमरू का पावडर जल पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता है। मात्र कुछ समय के लिए मछलियां बेहोश हो जाती हैं। इस दौरान ग्रामीण मछलियों को अपने कुण्डियाड़ा, फटियाड़ा, जाल तथा हाथों से पकड़ते हैं, जो मछलियां पकड़ में नहीं आ पाती हैं, वह बाद में ताजे पानी में जीवित हो जाती हैं।

बता दे की ऐतिहासिक मेले का शुभारंभ 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश ने किया था। तब से जौनपुर में निरंतर इस मेले का आयोजन किया जा रहा है। वहीं मेले में जौनपुर जौनसार की संस्कृति की झलक भी देँखने को मिलती है। मेले की खास बात यह है कि यहां पर टिमरू के पौधे की छाल निकालकर इसे धूप में सुखाने के बाद घराट में पीसा जाता है और नदी में डिमरू पाउडर डालने से पहले लोग ढोल-दमाउ की थाप पर जमकर नृत्य करते हैं। मछली पकड़ने के लिए स्थानीय लोगों द्वारा पारंपरिक यंत्र का प्रयोग किया जाता है और लोग शाम को गांव पहुंचकर इस त्योहार को धूमधाम से मनाते हैं।

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