झड़ीपानी भूमि विवाद में उत्तर रेलवे को कोर्ट से बड़ा झटका, बेदखली आदेश पर लगी रोक
मसूरी। झड़ीपानी क्षेत्र में उत्तर रेलवे और स्थानीय भूमिधरों के बीच लम्बे समय से चले आ रहे भूमि विवाद में नया मोड़ आ गया है। न्यायालय ने उत्तर रेलवे द्वारा जारी बेदखली आदेश पर रोक लगाते हुए रेलवे की कार्यवाही को बड़ा झटका दिया है। वहीं, स्थानीय सिविल कोर्ट ने भी रेलवे एक्ट के तहत अतिक्रमण हटाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है ।
बार्लोगंज स्थित एक होटल में आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता में झड़ीपानी भूमिधरों के संयोजक व वरिष्ठ अधिवक्ता अजय गोयल तथा प्रमुख उत्तराखंड आंदोलनकारी प्रदीप भंडारी ने न्यायालय के आदेशों और रेलवे प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर विस्तृत जानकारी साझा की अधिवक्ता अजय गोयल ने पत्रकारों को बताया कि जिला न्यायालय ने प्रशासन की संयुक्त जांच रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए संपदा अधिकारी द्वारा 16 सितंबर को जारी बेदखली आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। न्यायालय ने रिकॉर्ड पर गौर करते हुए स्पष्ट किया कि उत्तर रेलवे के पास पहले से ही उसके मूल स्वामित्व से अधिक भूमि दर्ज है। अदालत ने इस मामले में उत्तर रेलवे को अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
इसके अतिरिक्त, मसूरी सिविल कोर्ट ने भी रेलवे एक्ट के प्रावधानों के तहत स्थानीय निवासियों पर अतिक्रमण की कार्रवाई चलाने संबंधी उत्तर रेलवे की याचिका को निरस्त कर दिया है।
अजय गोयल ने कहा कि प्रशासन द्वारा इस क्षेत्र का चार बार सीमांकन किया जा चुका है। गढ़वाल मंडल आयुक्त द्वारा राजस्व अभिलेखों की विस्तृत रिपोर्ट पहले ही उच्च न्यायालय के समक्ष पेश की जा चुकी है, जिसमें यह स्पष्ट है कि जिन भूखंडों पर रेलवे नोटिस जारी कर रहा है, वे पुश्तैनी निजी भूमिधरों की जमीन हैं, न कि रेलवे विभाग की।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बावजूद रेलवे के कुछ अधिकारी और कर्मचारी अपनी मनमानी करते हुए अवैध रूप से स्थानीय काश्तकारों पर दबाव बना रहे हैं और क्षेत्र में भय का माहौल पैदा कर रहे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वक्ताओं ने ओक ग्रोव स्कूल प्रबंधन और रेलवे के कुछ उच्चाधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप लगाया।
उत्तराखंड आंदोलनकारी प्रदीप भंडारी ने कहा कि सैकड़ों वर्षों से बसे मूल निवासियों का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। रेलवे आज तक संबंधित भूमि पर अपने वैध स्वामित्व का एक भी पुख्ता दस्तावेज या खसरा-खतौनी पेश नहीं कर पाया है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रेलवे प्रशासन ने अपनी तानाशाही और स्थानीय भूमिधरों का उत्पीड़न बंद नहीं किया, तो इस आंदोलन को मसूरी से लेकर प्रदेश स्तर तक जन-आंदोलन का रूप दिया जाएगा।
”रेलवे अधिकारियों को भली-भांति ज्ञात है कि स्कूल परिसर की निर्धारित सीमा के बाहर रेलवे की एक इंच भी जमीन नहीं है। वास्तविकता यह है कि स्वयं ओक ग्रोव स्कूल ने कई स्थानीय भूमिधरों की जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है। अब पुलिस बल का दुरुपयोग कर दहशत फैलाई जा रही है ताकि काश्तकारों की पुश्तैनी जमीन छीनकर वहां आलीशान कोठियां बनाई जा सकें।”
