उत्तराखण्ड के पूर्व भाजपा विधायकों समेत कई बड़े नेताओं ने किया सियासत में उलटफेर

 

उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिला है, जहां दलबदल की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है। नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम के दौरान भाजपा और निर्दलीय खेमे के कई दिग्गज नेताओं ने कांग्रेस का ‘हाथ’ थाम लिया। इस सामूहिक जॉइनिंग को कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है, जिसने प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज कर दी है।

कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता के बाद सदस्यता कार्यक्रम हुआ, जिसमें उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी की मौजूदगी में नेताओं को औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल कराया गया। इस मौके पर कांग्रेस ने इसे संगठन विस्तार और आगामी चुनावों की तैयारी के रूप में पेश किया।

इस दौरान राजकुमार ठुकराल (रुद्रपुर के पूर्व भाजपा विधायक), लाखन सिंह नेगी (भीमताल से वर्तमान जिला पंचायत सदस्य), भीम लाल आर्य (घनसाली से पूर्व भाजपा विधायक), अनुज गुप्ता (पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष मसूरी), नारायण पाल (सितारगंज से पूर्व विधायक) और गौरव गोयल (पूर्व मेयर रुड़की) जैसे बड़े नाम कांग्रेस में शामिल हुए। ये सभी नेता अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखते हैं, जिससे कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूती मिलने की उम्मीद है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद मसूरी विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में खासा रोमांच बढ़ गया है। अनुज गुप्ता पहले ही कई बार सार्वजनिक रूप से यह संकेत दे चुके हैं कि वे 2027 के विधानसभा चुनाव में मसूरी सीट से ताल ठोक सकते हैं। ऐसे में उनकी कांग्रेस में एंट्री ने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदलने के संकेत दे दिए हैं।

गौरतलब है कि मसूरी में कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति पहले से ही पूरी तरह एकजुट नहीं रही है। यहां कई नेता अपने-अपने समर्थकों के साथ अलग-अलग खेमों में नजर आते रहे हैं और चुनाव के समय भी एकजुटता की कमी देखने को मिली है। अब अनुज गुप्ता के शामिल होने से यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी के दिग्गज नेता इस नई एंट्री को किस तरह स्वीकार करते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, अनुज गुप्ता साथ मसूरी विधानसभा प्रतियाशी गोदावरी थपलियाल ने भी इस मौके पर उनके साथ शामिल थी , जिससे यह संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में मसूरी सीट पर कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर मुकाबला और भी दिलचस्प हो सकता है।

कुल मिलाकर, यह दलबदल सिर्फ नेताओं के पार्टी बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक असर देखने को मिल सकते हैं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह के घटनाक्रम यह साफ संकेत दे रहे हैं कि उत्तराखंड की राजनीति में अभी और भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि कांग्रेस इस मौके को कितनी मजबूती से भुना पाती है और क्या वह आंतरिक गुटबाजी को खत्म कर एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरती है या नहीं।

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